"क्या कोई गुनाह इतना बड़ा हो सकता है कि खुदा की रहमत कम पड़ जाए?"
यह कहानी है फ़ैज़ की, जिसके लिए एक थप्पड़ सिर्फ एक पल की बेइज्जती नहीं थी, बल्कि उसके पूरे वजूद की हार बन गई थी. ज़ोया से किया गया वह इंतिक़ाम उसे एक ऐसे मोड़ पर ले आता है, जहाँ मंज़िल अब कोई मंज़िल नहीं, बल्कि खुद की तलाश है.
यह महज़ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि नफरत की आग से शुरू होकर सजदों की शांति तक पहुँचने वाला एक गहरा सफ़र है. फ़ैज़ की गलतियाँ उसे ऐसी गलियों में ले जाती हैं जहाँ पछतावा ही उसका इकलौता साथी है